ज्ञान पररस मररस योगी
ज्ञान पररस मररस योगी
★ ज्ञान पररस मररस योगी ★
ज्ञान कि परिभाषा करना वैसे तो बहोत ही कठिण कार्य है और ज्ञान का सीधा संबंध मानव के बुद्धी से है, संस्कार से है और ज्ञान के अनेक प्रकार है | जैसे सामाजीक ज्ञान, विद्यार्थी जिवन का ज्ञान, संस्कारीक ज्ञान, कौटुंबीक ज्ञान, भक्ती ज्ञान और ऐसे और भि विभिन्न प्रकार का ज्ञान है जिनका सिधा संबंध हमारे दैनंदीन जिवन मे बहोत ही महत्त्वपुर्ण है |
इसलिऐ आज हम मानवधर्म मे भक्ती ज्ञान का क्या महत्त्व है ये और उससे हमारे जिवन मे दैवी शक्ती का क्या प्रभाव पडता है, और ज्ञान का रस हमे हमारे जिवन के आखरी समय तक कैसे काम आयेगा यह सीख हमे हमारे महाणत्यागी बाबा जुमदेवजी ने दी है |
"ज्ञान पररस मररस योगी" ये अमुल्यवान शब्द महाणत्यागी बाबा जुमदेवजी के है, इन शब्दो मे जिवन के भक्ती ज्ञान का रस छिपा हुआ है और हमे भक्ती ऐसी करनी है की जिससे हमे दैवीशक्ती का रस प्राप्त हो सके, और यही रस हमे भगवान के तत्व शब्द नियम पर चलते रहने मे मदत करता है |
महाणत्यागी बाबा जुमदेवजीने हमे बताया है की मानवी जिवन मे दैवीशक्ती साध्य करने के लीऐ "मन कि एकाग्रता, एक चित्त, एक लक्ष , एक भगवान इनकी बहोत जरुरत है और यही दैवीशक्ती का उगमस्थान है |
मानवधर्म का सेवक भगवंतभक्ती के माध्यम से मानवधर्म के ज्ञान को आत्मसात करेगा, उसके सानिध्य मे रहेगा, मानवधर्म के शिकवण के अनुसार जीवन मे अपने कर्म करेगा, निष्काम भक्तीभाव से प्रसार और प्रचार मे अपना सहयोग देगा और इन सब तत्वोसे वो दुसरो की आत्मा मे परमात्मा ढुंढ पायेगा तभी जरुर परमात्मा के ज्ञान का रस उसके भक्तिज्ञान मे मिलेगा और तत्त्व, शब्द, नियम मे पुरे वेद पुराण का ज्ञान है और यही ज्ञान हमे परमात्मा से रुबरु कराता है |
मानवधर्म मे भक्ती का रस पिणा कोई कला नही है, यह सेवक कि अपने मार्ग प्रती प्रामाणिकता, ईमानदारी और निष्ठा है |महाणत्यागी बाबा जुमदेवजी ने सेवक को सिखाया है कि अपने अंदर का दुर्गुण मतलब मोह, माया, अहंकार, क्रोध, मद ,मत्सर नष्ट करके हमे बुद्धीमान बनना है और तत्त्व, शब्द, नियम के भक्ती ज्ञान का रस अपने अंदर तयार करके मानव मंदीर सजाना है !
महाणत्यागी बाबा जुमदेवजी ने हमे बताया है कि "ज्ञान पररस मररस योगी" जो सेवक भगवंत भक्ती के माध्यम से मानवधर्म के ज्ञान को सर्पश करेगा वह सोना बन जा जायेगा मतलब वह सेवक चोबिस कॕरेट सोने कि तरह शुद्ध हो जायेगा और वही सेवक दैवी शक्ती कै प्रती जागृत रहेगा !
मानवधर्म कि परिभाषा ही यह है कि हमे मार्ग स्विकार करते समय ही "मरे या जिये भगवंत नामपर" वचन देना पडता है और तभी भगवान सेवक के साथ खडा हो जाता है और उसी मानवधर्म के भगवंत भक्ती के ज्ञान के रस से उसी सेवक का परिस के जैसा रस तयार होकर सेवक ज्ञानी बन जाता है और वह सेवक योगी से कुछ कम नही होता है और भगवान के नामपर मरने का वचन देकर तत्व, शब्द, नियम का अपने दैनंदिन जिवन मे पालन करता है तभी वह योगी बनता है और इसे ही "ज्ञान पररस मररस योगी कहते है" !
और इसलिऐ मानवधर्म कि शिकवण है और महाणत्यागी बाबा जुमदेवजी कि भी वाणी है कि "तु मुझे दो वचन दे, मै तुझे दो तत्व दुंगा,
तु वचन दे मरनेका, मै अमृत कि वर्षा कर दु,
तु वचन दे तत्व, शब्द, नियम पर चलनेका,
मै तेरी आत्मा मे परमात्मा का रस भर दु |"
लिखने मे गलती होने से भगवान बाबा हनुमानजी और महाणत्यागी बाबा जुमदेवजी से क्षमा चाहता हु !
लेखन - परमात्मा एक सेवक
परमपुज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ वर्धमान नगर नागपूर
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