कर्मयोग एंव कर्मभोग
कर्मयोग एंव कर्मभोग
【"कर्मयोग एंव कर्मभोग"】
महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने स्थापन किया हुआ मानवधर्म कर्मप्रधान है। "जैसे कर्म वैसे फल" यह इस मार्ग का सिद्धांत है। महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने अपना पुरा जीवन निष्काम कार्य एंव निस्वार्थ भावना से व्यतीत किया है। बाबा के यही कर्म इस मार्ग की दैवी शक्ति ने मानवधर्म के मूल आधार के रूप में स्विकार किए है और इसीकारण यह चैतन्य दैवी शक्ति आज भी सेवकों के शब्दों पर कार्य कर रही है, जिससे हमें बाबा ने किए हुए निष्काम कार्यो की प्रचिती होती है।
बाबा का सारा जीवन ही निष्काम कर्म का जीता-जागता आदर्श है। उनके हर कदम पर, वाणी पर निष्काम कर्म की सिख व्याप्त है। बाबाने अपने जीवन से सभी सेवकों के लिए निष्काम कर्म का उदाहरण प्रस्तुत किया है। बाबा ने स्व-आचरण से सभी गोर-गरीब, दुखी लोगों के कल्याण के लिए निष्काम कर्म को अत्याधिक महत्व दिया है। बाबा का यही जीवनचरित्र हम सभी के लिए सदैव प्रेरणा का कार्य करता है और कदम-कदम पर हमें मार्गदर्शन करता है।
हमारे मार्ग में निष्काम कर्म करने से ही हमें मोक्ष प्राप्ति होती है। बाबाने कहाँ है कि,
"उस दैवी शक्ति को जो चाहिए, अगर वो मैंने नही दिया होता तो यह दैवी शक्ति मुझे भी कदापि साथ नहीं देती।"
इसलिए जो बाबाने स्वंय किया वही हमें करने को कहा है। बाबाने जिंदगीभर अपना खर्च अपने पैसों से एंव स्वंय के बलबूते किया। आज कोई भी सेवक या अन्य कोई भी व्यक्ति बाबा के कार्यों पर उंगली नही उठा सकता। ऐसा पारदर्शी जीवन बाबा ने व्यतीत किया।
आज भी मानवधर्म के मार्गदर्शक साधे कार्यो के सेवकों के यहाँ पानी तक नही पीते। यही निष्काम कार्य है। उसी तरह हमारे सेवक परिवार पर अगर कोई आपत्ति आती है या किसी की मृत्यु होती है, तब उस परिवार को भी हमे निष्काम एंव निस्वार्थ भावना से मदद करते हुए उस मदद के बदले कोई भी मुहावजा नही लेने की सिख हमें बाबा ने दी है। यह अनुच्छेद हमारी नियमावली में नियम क्रमांक १२ के रूप में शामिल किया गया है। अतः सभी सेवकगण पूरे मनोयोग से इस नियम का पालन करें एंव बाबा के आदेशों के साथ चलते हुए मुक्ति को प्राप्त हो। यही मानवधर्म है एंव यही मानवता है। जो बाबा ने हमें सिखाई है।
जब तक सेवक निष्काम कर्म को बाधक शत्रु-मित्र, अपना-पराया तथा नाम, रूप, गुण आदि भेदों को मिटाकर इनसे छुटकारा नहीं पा लेता, तब तक हम सही अर्थों में निष्काम कार्य करने में असमर्थ है एंव हमारी मुक्ति भी संभव नही। निस्वार्थ भावना से किया गया कर्म हमें निष्काम कर्मयोग की सिद्धियों तक पहुंचा देता है।
निष्काम कर्म करने से हमारी बुद्धि निर्मल होती है एंव हमें बाबा ने दिए हुए ४ तत्वों की उपलब्धि होती है। यही ४ तत्व मानवधर्म का आधार एंव शक्ति है। निष्काम कर्म से ही हमें आत्म-साक्षात्कार के अवसर उपलब्ध होते है। यह तभी संभव है, जब हम "एक चित्त, एक लक्ष्य, एक भगवान" इस वाक्य को चरितार्थ करते हुए अपना तन, मन, धन हम परमार्थ के कार्यो में लगाए।
महानत्यागी बाबा जुमदेवजी का हम सभी सेवकों पर यह उपकार है कि, हमारा जो मन संसार के साथ, भौतिक वस्तुओं के साथ, हराम के साथ, हर परिवर्तनशील चीजों के साथ जुड़ा हुआ था, उसे बाबा ने शाश्वत, निर्गुण, निराकार, २४ घंटे चैतन्य, अचल, अटल दैवी शक्ति के साथ जोड़ दिया है। हम सभी सेवकों पर बाबा के इसी उपकार के परिणामस्वरूप हमारी जीवन की सभी उलझने, दुख, पीड़ा सुलझ गई है। मानवी जीवन का सीधा उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त होना है और यही कर्मयोग है।
हमें पूरा अधिकार परमेश्वर को देते हुए निष्काम भावना से दुखी व्यक्ति की मदद करनी चाहिए। जिस तरह हम हमारे परिवार में कोई मदद करते है, तो उसका पारिश्रमिक नही लेते, उसी तरह मार्ग के सेवक भी हमारा परिवार है और इसी परिवार भाव को कायम रखकर हमें निस्वार्थ भावना से उनकी हरसंभव मदद करनी चाहिए।
जब हम किसी कार्य को करते वक्त अपने मन में स्वार्थ लाते है तब मोह, माया, अहंकार के वशीभूत यह विकार हमारे मन में उत्पन्न होते है, जो मनुष्य की मुक्ति के मार्ग में बाधा एंव बंधन बन जाते है। तब हम कर्मयोग के रास्ते से भटककर कर्मभोग के रास्ते पर अग्रेसर होते है। इसलिए बाबा ने हमें त्यागी वृत्ति से जीवन यापन करने को कहा है, यही मुक्ति का मार्ग है।
जिस तरह अगर हम किराये के घर में रहते है तो वो घर एक न एक दिन छोड़ना ही होता है। उसी प्रकार संसार के सभी संबंधों एंव वस्तुओं के प्रति भी यह धारणा रखें कि, यह सब शाश्वत नही है। जिस तरह हम किराया देकर टैक्सी, बस या रेल में सफर करते है या फिर स्वंय के निजी वाहन से सफर करते है, इससे सफर करने में या मंजिल पर पहुंचने में कोई फर्क नही पड़ता। हम सफर जिस भी वाहन से करे हमें उसे कही न कही छोड़ना ही है, उद्देश्य बस मंजिल तक पहुंचना है। उसी तरह यह जो हमारा शरीर है जिसमें हम जीवन भर रहते है, इसे भी हमें अंत में छोड़ना ही है। क्योंकि मानवी जीवन के सफर का उद्देश्य ही मोक्ष तक पहुंचना है, यही हमारी आखरी मंजिल है। इसीलिए जिसे भी हमें अंत में छोड़ना ही है जैसे शरीर, मान, सन्मान, पद, प्रतिष्ठा, प्रॉपर्टी, बैंक बैलेंस इन सबके प्रति मन में मोह रखना ही हमारे दुख का कारण है। जिससे हम कर्मभोग की खाई में धसते जाते है। यहा बाबा ने कहा हुआ एक वाक्य बहुत ही सार्थक है, "जितनी प्रीत हराम से उतनी प्रीत अगर भगवान से होय, चला जा वैकुंठ में पल्ला ना पकड़े कोय"।
हमें सेवक परिवार हो या कोई भी दुखी परिवार हो उन्हें विपत्ति में सगे-संबंधी बनकर बिना किसी मोह के मदद कर एकता को प्रस्थापित करना चाहिए एंव मानवधर्म की ममतामयी छवि समाज में अवलोकित कर मानवधर्म का प्रचार एंव प्रसार करना चाहिए। यही मानवधर्म है ओर यही कर्मयोग की दिशा है।
लिखने में भुलवश कोई गलती हुई है तो "भगवान बाबा हनुमानजी" एंव "महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" इनसे क्षमा प्रार्थी हूँ।
◆ लेखन :- रवि नारायणजी मेश्राम
पत्ता :- बी-५२, शिवछत्रपती नगर, कामठी, जि. नागपूर
सेवक नंबर :- ४०५४
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